आंगनवाड़ी में पोषण मटके की ‘टम्मक टू’

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आंगनवाड़ी में पोषण मटके की ‘टम्मक टू’

आपको बचपन में पढ़ी वह कविता टम्मक टू, बुढ़िया और वह मटका याद है। वही मटका जिसमें बैठकर बुढ़िया राह के चीते—शेरों से बचते बचाते अपनी ससुराल पहुंच गई थी। मटका उस बुढ़िया के बहुत काम आया।

मध्यप्रदेश में इन दिनों गांव—गांव में मटके की ही चर्चा हो रही है। यह पोषण मटका गांव—गांव में नजर आ रहा है। मटके को लोग खास चीजों से भर रहे हैं वह भी एक खास वजह से।

दरअसल देश भर में सितम्बर महीने को पोषण माह के रूप में मनाया जा रहा है। मध्यप्रदेश में इस अभियान के तहत बच्चों की कोविड19 गाइडलाइन का पूरा पालन करते हुए वृदिध निगरानी की जा रही है ताकि बच्चे किसी भी तरह के संक्रमण से सुरक्षित रहें और उनके c स्तर का भी पता चलता रहे।

इस अभियान को रचनात्मक बनाने के लिए कई प्रयोग किए जा रहे हैं। इसमें इस बार मटके को शामिल किया गया है। मटका यानी सबका पेट भरने वाला पात्र। मटके में अमृत से लेकर अनाज, पानी सब कुछ समाया है। यानी मटका समृदिध का प्रतीक है।

पहले इन्हीं मटकेनुमा मिटटी की कोठियों में अन्न सुरक्षित रखने की परम्परा रही है। मटका हमारी परम्परा और संस्कृति से गहरे तक जुड़ा है। जिसका मटका विविध प्रकार के अन्न से भरा है, वह सुखी है।

मध्यप्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने खुद इस  पोषण  जनअभियान की बागडोर संभाली है। उन्होंने पोषण अभियान के एक आनलाइन कार्यक्रम में बताया कि मटके के माध्यम से कुपोषण दूर करने में सरकार के साथ समुदाय भी जुड़ गया है। सरकार तो भरसक कोशिश कर रही है अब सरकार के साथ समाज को भी अपनी भूमिका निभानी चाहिए।

इसके लिए राज्य की पोषण प्रबंधन रणनीति जारी की गई है। इसके तहत हर गांव में अन्नपूर्णा पंचायत बनाई जाएगी, जिसमें पंचायत, नगरीय निकाय, स्व-सहायता समूह, स्कूल प्रबंधन समिति, वन प्रबंधन समिति सहित अन्य लोगों को जोड़ा जाएगा। पोषण और स्वास्थ्य सेवाओं की गुणवत्ता पर निगरानी रखना इस पंचायत का काम होगा।

मुख्यमंत्री ने प्रदेश भर के लोगों से अपील की है कि आंगनवाड़ी में रखे इन मटकों में सक्षम परिवारों के सहयोग से फल, सब्जी, अनाज आदि एकत्र किया जाएगा जिसका कमजोर बच्चों एवं महिलाओं के पोषण स्तर को बढ़ाने के लिए इनका उपयोग किया जाएगा।

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मध्यप्रदेश की हर एक आंगनवाड़ी में यह मटका अभियान आंगनवाड़ी की दीदीयों द्वारा चलाया पोषण माह में शुरू कर दिया गया है। इसका व्यापक असर दिखाई दे रहा है। लोग मटके के माध्यम से खुद को आंगनवाड़ी से जोड़ रहे हैं।

किसी के घर में सब्जी है तो सब्जी, किसी के घर में अनाज है तो अनाज, किसी के घर में दालें हैं तो दाल। इससे दो फायदे हैं, सबसे बड़ा फायदा तो यह कि समुदाय के लोग सीधे तौर पर आंगनवाड़ियों से जुड़ रहे हैं, उनमें अपने समुदाय के कमजोर बच्चों या महिलाओं के प्रति एक जागरुकता आ रही है, और एक चेतना भी।

चेतना कमजोरी दूर करने की, कुपोषण दूर भगाने की, अपने समुदाय को सशक्त बनाने की। दूसरी ओर खानपान में विविधता भी आ रही है। यह कुपोषण के सामुदायिक प्रबंधन की एक ठोस पहल है, न कि दया या याचना की। 

इसके माध्यम से स्थानीय पोषक आहारों का संग्रह हो रहा है जो समुदाय के सबसे अति कम वजन और कम वजन के कमजोर तक आंगनवाड़ी के माध्यम से पहुंच रहा है। इससे पोषण में विविधता भी आएगी, और कमजोर पोषण वाले बच्चों और महिलाओं की पोषण की स्थिति मजबूत होगी।

श्योपुर जिले के सुपरवाइजर सुषमा सोनी इस अभियान को महत्वपूर्ण बताती है।। वह कहती हैं कि इस अभियान को समुदाय में बहुत अच्छा रिस्पांस मिल रहा है। इसमें पुरुषों की भागीदारी भी हो रही है।

सुषमा बताती हैं कि बच्चा यदि कुपोषित है तो केवल माता के कारण नहीं बल्कि पिता के कारण भी होता है जिसमें बच्चे के पोषण पर ध्यान देने के लिए माता के साथ साथ पिता की भी जिम्मेदारी होती है।

 

पोषण माह में समुदाय के बड़े किसानों को भी जोड़ने की पहल की जा रही है। उन्हें संकल्प दिलाया जा रहा है कि वह अपने क्षेत्र के कमजोर पोषण वाले बच्चों, महिलाओं, गर्भवती महिलाओं, खून की कमी वाले बच्चों और युवतियों को अपनी इच्छा और क्षमताअनुसार खादय सामग्रियों जैसे फल, अनाज, हरी साग—सब्जियों को साझा करेंगे।

मटके को आंगनवाड़ियों में समुदाय की ओर से मिलने वाली सामग्री से सजाया भी जा रहा है, इससे यह पूरा अभियान सुंदर बन गया है।

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