पोषण के लिए महत्वपूर्ण हैं शिशु के पहले एक हजार दिन

पोषण के लिए महत्वपूर्ण हैं शिशु के पहले एक हजार दिन

जीवन की बुनियाद पहले हजार दिन हैं। मानव मस्तिष्क का 80 प्रतिशत विकास इन 1000 दिनों में होता है। इस अवधि में एक शिशु ने जितना बेहतर पोषण प्राप्त कर लिया, पूरा जीवन उतना ही बेहतर हो जाता है। इन दिनों की लापरवाही जीवन भर का कष्ट साबित होती है। इसलिए जीवन के इन पहले हजार दिनों का ध्यान रखा जाना बहुत जरूरी है। यह भी समझना होगा कि इन एक हजार दिनों की जिम्मेदारी केवल मां की नहीं है। एक शिशु की परवरिश यानी पोषण, टीकाकरण, स्तनपान, संस्थागत प्रसव, स्वास्थ्य जांच आदि में उसके पिता और परिवार के अन्य लोगों की भी उतनी ही महत्वपूर्ण भूमिका है। 

भारत में हर साल पैंतीस लाख से अधिक बच्चे अपना पांचवां जन्मदिन नहीं मान पाते। मध्यप्रदेश में भी हर एक हजार जीवित जन्मे बच्चों में से 47 बच्चे अब भी अपना पहला जन्मदिन नहीं मना पाते हैं। पोषण संबंधित अन्य परेशानियों जैसे कद छोटा रह जाना, मानसिक विकास, खराब स्वास्थ्य, बीमारियों का आसानी से शिकार हो जाने सरीखी समस्याओं से भी दो चार होते हैं। उचित पोषण के बिना बच्चों के विकास में रुकावट, बार-बार गंभीर बीमारियों के संक्रमण और मृत्यु की संभावना बढ़ जाती है।

इस समस्या से निपटा जा सकता है जीवन के आरंभिक 1000 दिनों में माता और शिशु के बेहतर पोषण और देखरेख से। एक हजार दिन यानी गर्भधारण से प्रसव तक कुल 270 दिन, जन्म से 6 माह की आयु तक कुल 180 दिन और शिशु के 6 माह से 24 माह होने तक कुल 570 दिन। 

 यह समझना जरूरी है कि एक स्वस्थ मां ही तंदुरुस्त बच्चे को जन्म दे सकती है। इसलिए महत्वपूर्ण हो जाता है कि गर्भावस्था से ही उसकी स्वास्थ्य देखरेख और पोषण पर ध्यान दिया जाए। उन्हें समस्त स्वास्थ्य सेवाएं और पोषण दिया जाए। परिवार भी देखरेख करे और सरकारी योजनाओं का संपूर्ण लाभ लें। इसके लिए सबसे पहले परिवार के ढांचे में एक स्त्री के साथ का भेदभाव खत्म करना होगा। पितृसत्तात्मक समाज में अब भी महिलाओं के साथ समानता का व्यवहार एक चुनौती बना हुआ है। इसका असर महिलाओं के पोषण और स्वास्थ्य देखरेख पर भी नजर आता है।   

सरकार शिशु के इन एक हजार दिनों की पोषण सुरक्षा के लिए पूरी तरह प्रतिबदध है। इसकी शुरुआत उसकी गर्भावस्था से ही हो जाती है। उसे पोषण आहार, टीकाकरण, स्वास्थ्य जांचों की सुविधाएं देकर सरकार अपनी जिम्मेदारी निभाती है। यही नहीं एक महिला को आंगनवाड़ी अपना घर जैसी लगे इसके लिए कई ऐसे आयोजन होते हैं, जैसे महिला की गोदभराई। इससे आंगनवाड़ी का रिश्ता शुरुआत से ही जुड़ जाता है। महिला को मजबूत बनाने के लिए आयरन फोलिक एसिड की गोली उसके शरीर में लौह तत्वों की कमी को पूरा करती है। साथ ही कैल्शियम की गोलियां भी दी जाती हैं। नियमित निगरानी से जहां स्वस्थ्य बचपन की नींव डलती है वहीं संस्थागत प्रसव के लिए प्रेरित करके उसे पूरी स्वास्थ्य सुरक्षा भी दी जाती है।  

हालांकि यह बात अब कोई नई नहीं है कि प्रसव के बाद शिशु को जल्दी से जल्दी स्तनपान करवाना है, लेकिन फिर भी यह बात याद रहे, इसके लिए आंगनवाड़ी में यह रटवा दी जाती है, ताकि कोई लापरवाही न रहे। हमारे प्रदेश में सबसे संस्थागत प्रसव में तो आमूलचूल सुधार आया है, लेकिन पहले घंटे में शिशु को स्तनपान करवाने का प्रतिशत अभी भी कम है। क्योंकि इसमें पुरुषों की या परिवार की पूरी भागीदारी नहीं है। 

हमारे यहां स्तनपान को केवल मां का काम माना जाता है, क्योंकि कुदरत ने उसे ऐसा शरीर और क्षमता दी है, लेकिन बच्चे के पोषण की जिम्मेदारी उसके पिता या परिवार के अन्य सदस्यों पर भी है, इस जिम्मेदारी को समझना चाहिए और शिशु को शीघ्र और छह माह तक केवल स्तनपान के व्यवहार को पूरा सहयोग देना चाहिए। छह महीने तक केवल स्तनपान का व्यवहार अपनाकर शिशु मृत्यु को 13 प्रतिशत तक कम किया जा सकता है। 

प्रसव के बाद भी केवल शिशु ही नहीं माता के पोषण पर भी ध्यान देना जरूरी है, इसलिए उसके आहार की निगरानी और परामर्श, पूरक पोषण आहार, पूरा आराम, आयरन फॉलिक एसिड और कैल्शियम की गोलियां देना चाहिए। छह माह के बाद शिशु को ऊपरी आहार की शुरूआत कर देनी चाहिए। प्रसव के बाद शिशु और मां के लिए जरूरी टीकों के बारे में आंगनवाड़ी में पूरी जानकारी होती है, आंगनवाड़ी वाली दीदी बताती भी हैं, लेकिन इसमें परिवार की भी जिम्मेदारी है कि वह शिशु को सभी टीके लगवा लें। 

छह माह तक केवल स्तनपान शिशु के लिए पर्याप्त आहार होता है। कुदरत ने मां के दूध में ऐसी ताकत दी है कि इसके अलावा उसे किसी और चीज की आवश्यकता भी नहीं होती है। छह माह के बाद जरूर उसके एक हजार दिन पूरे होने तक उसके विशेष आहार का ख्याल रखा जाना चाहिए। आहार में विविधता रखने से शिशु की रुचि बनी रहती है। एक साथ नहीं खिलाकर थोड़ा—थोड़ा खिलाने से उसको पचाने में आसानी होती है। जो शिशुओं के बचपन के ये एक हजार दिन पोषण से भरपूर होते हैं उनका पूरा जीवन स्वास्थ्य के नजरिए से खुशहाल होता है। इन 1000 दिवसों में पोषण एवं स्वास्थ्य सेवाएं, पर्याप्त संतुलित आहार सुनिश्चित किया जाए तो महिलाओं तथा शिशुओं से सम्बंधित समस्त पोषण स्वास्थ्य मानकों में तेजी से सुधार हो सकता है।

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